पर्व कैलेंडर

विश्वकर्मा पूजा 2027

सूर्य का कन्या राशि में प्रवेश — सृष्टि के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा की पूजा, जिसमें हर शिल्प के औज़ार, यंत्र और मशीनें पूजी जाती हैं।

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विश्वकर्मा पूजा 2027 तिथि
शुक्रवार, 17 सितंबर 2027
तिथि: सौर पर्व — संक्रांति
संक्रांति क्षण: 01:53 PM (IST)
विश्वकर्मा पूजा 2027
आरंभ में
शीघ्र आरंभ

आज का पंचांग

काशी संदर्भ · तुरंत गणना
तिथि
नवमी
तक 17:50
नक्षत्र
पूर्व आषाढ़ा
तक 04:31
योग
सौभाग्य
करण
कौलव
सूर्योदय
05:45
सूर्यास्त
17:57
चंद्र राशि
धनु
सूर्य राशि
कन्या

मुहूर्त और समय

काशी/IST · खगोलीय गणना
  • संक्रांति क्षण13:53

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पर्व-दिन शास्त्रीय नियमों से निर्धारित हैं — उदया, प्रदोष, निशिता, मध्याह्न या अपराह्न व्यापिनी, जैसा प्रत्येक पर्व का विधान है — काशी/वाराणसी (IST) हेतु गणना। कुछ वर्षों में क्षेत्रीय पालन एक दिन आगे-पीछे हो सकता है।

विश्वकर्मा पूजा की पूजा विधि, व्रत नियम और कथा पढ़ें

विश्वकर्मा पूजा — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विश्वकर्मा पूजा कब है?

कन्या संक्रांति को, जिस दिन सूर्य निरयण कन्या राशि में प्रवेश करते हैं — बंगाली भाद्र मास का अंतिम दिन। अधिकांश वर्षों में 17 सितंबर और कुछ वर्षों में 16 सितंबर को। इस वर्ष की तिथि तथा संक्रांति का सटीक क्षण ऊपर दिया गया है।

विश्वकर्मा पूजा कभी 16 तो कभी 17 सितंबर को क्यों?

क्योंकि यह सौर पर्व है, जो तिथि से नहीं बल्कि सूर्य के कन्या-प्रवेश से निर्धारित होता है। वह क्षण प्रतिवर्ष लगभग छह घंटे खिसकता है और प्रत्येक अधिवर्ष पर पुनः स्थिर होता है, अतः जिस अंग्रेज़ी तिथि पर वह पड़ता है वह 16 और 17 सितंबर के बीच बदलती रहती है। जो 17 सितंबर निश्चित रूप में उद्धृत मिलता है वह भारत सरकार की प्रतिबंधित अवकाश परिपाटी है, गणना की गई तिथि नहीं।

क्या विश्वकर्मा पूजा और कन्या संक्रांति एक ही हैं?

दोनों एक ही दिन रखी जाती हैं। कन्या संक्रांति खगोलीय घटना है — सूर्य का कन्या राशि में गोचर — और विश्वकर्मा पूजा उस दिन का अनुष्ठान है, इसीलिए दोनों तिथियाँ सदैव मिलती हैं।

क्या विश्वकर्मा पूजा पर व्रत रखा जाता है?

नहीं। यह कार्यस्थल पर पूजन और कृतज्ञता का दिन है, व्रत का नहीं। औज़ार और मशीनें स्वच्छ कर पूजी जाती हैं, दिन भर अप्रयुक्त रखी जाती हैं, और प्रसाद वहाँ कार्यरत सभी में बाँटा जाता है।

विश्वकर्मा पूजा कौन मनाता है?

कारीगर, अभियंता, मिस्त्री, चालक, बुनकर, बढ़ई, लोहार और कारखाना-कर्मी — वे सभी जिनकी जीविका औज़ारों से चलती है। यह पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, असम और बिहार में सबसे बड़ा है, जहाँ इस दिन कार्यशालाएँ और कारखाने बंद रहते हैं।

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