श्रावण मास · भगवान शिव

सावन (श्रावण मास)

शिव का सर्वाधिक पवित्र मास — सावन सोमवार व्रत, कांवड़ यात्रा और रुद्राभिषेक का मास।

सावन (श्रावण मास) में शिवलिंग के पास ध्यानमग्न भगवान शिव, पृष्ठभूमि में हिमालयी मंदिर पर बरसता सावन — वेदज्योतिक्स भक्ति-चित्र

सावन 2026

उत्तर भारत · पूर्णिमांत
गुरुवार, 30 जुलाई 2026शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
अमांत क्षेत्र
गुरुवार, 13 अगस्त 2026शुक्रवार, 11 सितंबर 2026
सावन सोमवार
4
सावन शिवरात्रि
मंगलवार, 11 अगस्त 2026
सावन 2026 की पूरी तिथियाँ व सोमवार व्रत कैलेंडर देखें

सावन का महत्व

श्रावण शिव का मास है। यह वर्षा के चरम पर पड़ता है, जब धरती हरी होती है और समुद्र-मंथन स्मरण किया जाता है — शिव ने सृष्टि की रक्षा हेतु इसी ऋतु में हलाहल विष पिया, और मास के जलार्पण उस जलते कंठ को शीतल करते हैं। प्रत्येक सोमवार सावन सोमवार व्रत रखा जाता है, और श्रद्धालु पैदल गंगाजल (कांवड़ यात्रा) लाकर लिंग पर चढ़ाते हैं।

सावन के अनुष्ठान

  • प्रत्येक सोमवार सावन सोमवार व्रत
  • शिवलिंग का रुद्राभिषेक और जलाभिषेक
  • कांवड़ यात्रा — पैदल गंगाजल लाना
  • बेल-पत्र, धतूरा और श्वेत पुष्प अर्पण
  • शिव चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ
  • मंगलवार को सुहागिनों का मंगला गौरी व्रत

सावन सोमवार व्रत कैसे रखा जाता है

  1. व्रत का संकल्प सोमवार की सुबह स्नान के बाद, पहली अर्घ्य से पहले लिया जाता है — बहुत लोग शिवलिंग या शिव के चित्र के सामने खड़े होकर बोलकर संकल्प करते हैं।
  2. अधिकतर लोग फलाहार व्रत रखते हैं — दिन भर फल, दूध और जल, और सांझ की पूजा के बाद एक बार भोजन। निर्जला व्रत सबसे कठिन रूप है और सबके लिए आवश्यक नहीं माना जाता।
  3. जहाँ संभव हो, शिव पूजा दो बार की जाती है — प्रातः स्नान के बाद और फिर प्रदोष काल में, अर्थात सूर्यास्त के आसपास का समय, जो इस मास के सोमवार का सबसे शुभ काल माना गया है।
  4. पारण सांझ की पूजा और आरती के बाद होता है — पहले भोग शिव को अर्पित कर के फिर स्वयं ग्रहण किया जाता है। कुछ परंपराओं में पारण अगली सुबह होता है; दोनों प्रचलित हैं।
  5. सोलह सोमवार एक अलग, लंबा व्रत है जिसे बहुत लोग इसी मास से आरंभ करते हैं — यह सावन का नियम नहीं, अपना संकल्प है।

व्रत में आहार

  • सामान्यतः लिया जाता है — फल, दूध, दही, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, आलू, सेंधा नमक, मेवे और जल।
  • सामान्यतः वर्जित — अनाज और दालें, साधारण नमक, प्याज-लहसुन, तथा मांस, मछली व अंडा। कई घरों में यह पूरे मास वर्जित रहता है, केवल सोमवार को नहीं।
  • व्रत रखने वाले पूरे मास मदिरा से दूर रहते हैं।
  • व्रत को अपनी स्थिति के अनुसार ढाला जाता है। बच्चे, वृद्धजन, गर्भवती स्त्रियाँ, रोगी और दवा लेने वाले प्रायः हल्का व्रत रखते हैं या नहीं रखते — परंपरा इसे दोष नहीं मानती। किसी रोग की स्थिति में उपवास के नियम से पहले अपने चिकित्सक की सलाह मानें।

जलाभिषेक व पूजा विधि

  1. हो सके तो सूर्योदय से पूर्व स्नान करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  2. जलाभिषेक करें — शिवलिंग पर धीमी, अखंड धार से जल चढ़ाएँ और 'ॐ नमः शिवाय' का जप करते रहें।
  3. जहाँ परंपरा हो, पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद और शक्कर — अर्पित करें और फिर शुद्ध जल से पुनः अभिषेक करें।
  4. बिल्व पत्र चिकनी सतह नीचे की ओर करके चढ़ाएँ, साथ में धतूरा, श्वेत पुष्प, भांग के पत्ते, अक्षत और चंदन।
  5. घी का दीप और धूप जलाएँ, नैवेद्य अर्पित करें और आरती से समापन करें। पारण से पहले शिव चालीसा या सोमवार व्रत कथा सुनने-पढ़ने की परंपरा है।

पूजा सामग्री

  • बिल्व पत्र — तीन दल वाले, यथासंभव
  • शुद्ध जल, और उपलब्ध हो तो गंगाजल
  • पंचामृत हेतु दूध, दही, घी, शहद व शक्कर
  • श्वेत पुष्प, धतूरा और भांग के पत्ते
  • अक्षत, चंदन, विभूति
  • घी का दीपक, धूप, कपूर
  • नैवेद्य के लिए फल व मिष्ठान्न

सावन की प्रमुख साधनाएँ

सावन सोमवार व्रत
मास के सोमवार, शिव को समर्पित। सावन की सबसे प्रसिद्ध साधना — इसी कारण यह मास दिनों से नहीं, सोमवारों से गिना जाता है।
मंगला गौरी व्रत
मास के मंगलवार, माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप हेतु। परंपरा में विवाहित स्त्रियाँ परिवार के कल्याण के लिए और अविवाहित कन्याएँ सुयोग्य वर की कामना से रखती हैं।
कांवड़ यात्रा
कांवड़िये पैदल चलकर गंगाजल लाते हैं — मुख्यतः हरिद्वार, गौमुख और सुल्तानगंज से — और सावन शिवरात्रि पर शिव मंदिर में अर्पित करते हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हरियाणा व दिल्ली में सर्वाधिक।
सावन शिवरात्रि
इस मास की मासिक शिवरात्रि, कृष्ण चतुर्दशी को। रात्रि जागरण और जलाभिषेक की परंपरा है, और अधिकांश कांवड़ जल इसी दिन चढ़ाया जाता है।

क्या करें

  • पूरे मास प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ, उन दिनों भी जब व्रत न हो
  • बिल्व पत्र ताज़े और अखंडित रखें
  • पारण से पूर्व सोमवार व्रत कथा सुनें या पढ़ें
  • अन्न, वस्त्र या जल का दान करें — दान इस मास का अंग है

क्या न करें

  • शिवलिंग पर तुलसी, केतकी पुष्प, हल्दी और नारियल का जल न चढ़ाएँ
  • खंडित या कटा हुआ बिल्व पत्र प्रयोग न करें
  • यदि व्रत को संकल्प रूप में रखना है तो बिना संकल्प आरंभ न करें
  • यदि व्रत से स्वास्थ्य बिगड़ रहा हो तो उसे न खींचें — पारण कर लें और पूजा अर्पित करें

क्षेत्रीय परंपराएँ

उत्तर भारत (पूर्णिमांत)
मास आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन आरंभ होकर श्रावण पूर्णिमा पर समाप्त होता है। सोमवार मुख्य व्रत है और कांवड़ यात्रा यहीं सबसे बड़ी होती है।
महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, गोवा (अमांत)
श्रावण लगभग पंद्रह दिन बाद, अमावस्या से अमावस्या तक चलता है — इसलिए श्रावण सोमवार की गिनती अलग पड़ती है। यहाँ श्रावण शनिवार और मंगला गौरी भी व्यापक रूप से रखे जाते हैं।
तमिलनाडु व केरल
सौर मास 'आडी' श्रावण के साथ चलता है। आडी के व्रत सौर पंचांग से तय होते हैं, यहाँ दी गई चांद्र मास सीमाओं से नहीं।
नेपाल
श्रावण विक्रम संवत के अनुसार चलता है; पशुपतिनाथ के सोमवार प्रमुख हैं, और अविवाहित कन्याएँ पूरे मास हरी चूड़ियाँ पहनती हैं।

सावन की तिथियाँ वर्ष अनुसार

सावन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सावन क्या है?

सावन (श्रावण मास) हिन्दू चांद्र वर्ष का पाँचवाँ मास है और भगवान शिव को समर्पित सबसे पवित्र महीना माना जाता है। वर्षा ऋतु का यह मास सोमवार व्रत, जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा के लिए जाना जाता है।

सावन और श्रावण मास में क्या अंतर है?

कोई अंतर नहीं — श्रावण मास इस मास का संस्कृत नाम है और सावन उसी का प्रचलित हिन्दी रूप। दोनों एक ही अवधि हैं।

सावन की तिथियाँ हर वर्ष क्यों बदलती हैं?

हिन्दू मास चंद्रमा की कलाओं से तय होते हैं, सूर्य-आधारित ग्रेगोरियन कैलेंडर से नहीं। चांद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा होता है, इसलिए सावन हर वर्ष लगभग 11 दिन पहले आ जाता है — और जिस वर्ष अधिक मास पड़ता है, वह लगभग 19 दिन आगे खिसक जाता है।

उत्तर और दक्षिण भारत में सावन की तिथियाँ अलग क्यों होती हैं?

दो पंचांग पद्धतियाँ हैं। पूर्णिमांत (उत्तर भारत) में मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है; अमांत (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु) में अमावस्या पर। इसी कारण उत्तर भारत में सावन लगभग पंद्रह दिन पहले आरंभ होता है। पर्व दोनों में एक ही दिन पड़ते हैं, क्योंकि वे तिथि से तय होते हैं — केवल मास की सीमा अलग है।

सावन सोमवार व्रत क्या है?

व्रत का संकल्प सोमवार की सुबह स्नान के बाद, पहली अर्घ्य से पहले लिया जाता है — बहुत लोग शिवलिंग या शिव के चित्र के सामने खड़े होकर बोलकर संकल्प करते हैं। सामान्यतः लिया जाता है — फल, दूध, दही, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, आलू, सेंधा नमक, मेवे और जल।

मंगला गौरी व्रत क्या है?

मास के मंगलवार, माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप हेतु। परंपरा में विवाहित स्त्रियाँ परिवार के कल्याण के लिए और अविवाहित कन्याएँ सुयोग्य वर की कामना से रखती हैं।

कांवड़ यात्रा क्या है?

कांवड़िये पैदल चलकर गंगाजल लाते हैं — मुख्यतः हरिद्वार, गौमुख और सुल्तानगंज से — और सावन शिवरात्रि पर शिव मंदिर में अर्पित करते हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हरियाणा व दिल्ली में सर्वाधिक।

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