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शारदीय नवरात्रि प्रारंभ 2026

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को घटस्थापना — शारदीय नवरात्रि।

शारदीय नवरात्रि प्रारंभ 2026 date
रविवार, 11 अक्टूबर 2026
Tithi: आश्विन शुक्ल प्रतिपदा
Tithi window: 09:20 PM, शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 → 09:30 PM, रविवार, 11 अक्टूबर 2026
शारदीय नवरात्रि प्रारंभ 2026
आरंभ में
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आज का पंचांग

काशी संदर्भ · तुरंत गणना
तिथि
सप्तमी
तक 20:47
नक्षत्र
अश्विनी
तक 21:21
योग
शूल
करण
विष्टि
सूर्योदय
05:26
सूर्यास्त
18:41
चंद्र राशि
मेष
सूर्य राशि
कर्क

मुहूर्त और समय

काशी/IST · खगोलीय गणना
  • संकल्प (सूर्योदय)05:54
  • सूर्यास्त17:35
  • व्रत अवधि (तिथि)2026-10-10 · 21:20 → 21:30
  • पारण (तिथि समाप्ति)21:30

शारदीय नवरात्रि प्रारंभ का महत्व

शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होकर नौ रात्रि चलती है, प्रत्येक दुर्गा के एक स्वरूप को समर्पित: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। ये नौ देवियाँ नहीं, अपितु एक ही देवी के नौ स्तर हैं — पर्वत की पुत्री से आरंभ होकर सिद्धि देने वाली तक।

पर्व का आरंभ घटस्थापना से होता है, जो प्रतिपदा तिथि के प्रथम तृतीयांश में की जाती है। कलश के चारों ओर मिट्टी में जौ बोए जाते हैं और नौ दिन अंकुरित होने दिए जाते हैं; अंकुरों की ऊँचाई आगामी वर्ष का संकेत मानी जाती है।

अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन होता है, जिसमें बालिकाओं को देवी का जीवंत स्वरूप मानकर पूजा जाता है, भोजन कराया जाता है और विदाई पर उपहार दिए जाते हैं।

शारदीय नवरात्रि प्रारंभ की पौराणिक पृष्ठभूमि

नवरात्रि उन नौ रात्रियों का स्मरण है जिनमें दुर्गा ने महिषासुर से युद्ध किया, जिसे कोई देव या मनुष्य नहीं मार सकता था और जिसका वध देवी ने दसवें दिन — विजयादशमी को किया। नौ रात्रियों में वे नवदुर्गा रूप में पूजी जाती हैं, शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक नौ रूप, प्रत्येक उनकी शक्ति का एक सोपान। पूर्वी कथा में, राम ने लंका पर चढ़ाई से पूर्व असमय में दुर्गा की पूजा की (अकाल बोधन), इसीलिए शरद नवरात्रि और दुर्गा पूजा साथ आते हैं।

ऋतु एवं वैज्ञानिक महत्व

शरद नवरात्रि ऋतुओं की संधि (ऋतु-संधि) पर है, जब वर्षा शरद को मार्ग देती है — वर्ष के उन दो मोड़ों में से एक जब शरीर परिवर्तन के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होता है। नौ-दिवसीय सात्त्विक व्रत, हल्का और अन्न-रहित, ठीक उसी क्षण एक ऋतु-शुद्धि है जब रोग-प्रतिरोधक क्षमता घटती है। घटस्थापना पर बोया और नौ दिनों में उगा जौ आने वाली फसल का जीवंत संकेत है।

आध्यात्मिक महत्व

नौ रात्रियाँ एक आंतरिक आरोहण हैं। महिषासुर वह अहंकार है जिसे कोई साधारण प्रयत्न परास्त नहीं कर सकता; केवल शक्ति, जाग्रत स्त्री-सामर्थ्य, उसे काटती है। नवदुर्गा शैलपुत्री — पृथ्वी में स्थित — से सिद्धिदात्री — जो सिद्धि देती हैं — तक एक मार्ग रचती हैं; व्रत और जागरण साधक को उस मार्ग पर कुछ दूर ले जाने के लिए हैं, ताकि दशमी केवल देवी की नहीं, साधक की भी विजय हो।

शारदीय नवरात्रि प्रारंभ पूजा विधि

  1. 1प्रतिपदा को प्रातः स्नान कर पूजा-स्थल स्वच्छ करें। शुद्ध मिट्टी बिछाकर उसमें जौ बोएँ।
  2. 2ताम्र अथवा मिट्टी के कलश में जल भरकर सिक्का, अक्षत, दूर्वा और सुपारी डालें। ऊपर आम्रपत्र और लाल वस्त्र में लिपटा नारियल रखें।
  3. 3कलश को बोई हुई मिट्टी पर स्थापित करें। यही घटस्थापना है — इसे तिथि के प्रथम तृतीयांश में करें।
  4. 4समीप दुर्गा जी की प्रतिमा स्थापित करें और यदि नौ दिन सँभाल सकें तो अखंड ज्योति जलाएँ।
  5. 5प्रतिदिन उस दिन के देवी-स्वरूप का पूजन करें, उनसे संबंधित पुष्प और भोग अर्पित करें, तथा दुर्गा सप्तशती अथवा दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
  6. 6अष्टमी अथवा नवमी को कन्या पूजन करें: कन्याओं के चरण धोएँ, तिलक लगाएँ, पूरी, हलवा और चना खिलाएँ, और उपहार दें।
  7. 7दशमी को कलश और जौ के अंकुरों का विसर्जन करें, और अंकुर प्रसाद रूप में वितरित करें।

पूजा सामग्री

  • घटस्थापना हेतु कलश
  • स्वच्छ मिट्टी और जौ के बीज
  • लाल वस्त्र और चुनरी
  • नारियल और आम के पत्ते
  • दुर्गा की मूर्ति या चित्र
  • लाल गुड़हल और पुष्प
  • अखंड ज्योत (नौ दिन जलता दीप)
  • कुमकुम, अक्षत, सोलह शृंगार
  • धूप और कर्पूर

मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

Om Aim Hreem Kleem Chamundayai Vichche

नवार्ण मंत्र, जो देवी का नवाक्षर स्वरूप में आवाहन करता है।

व्रत के नियम

  • व्रत नौ दिन रखा जा सकता है, अथवा केवल प्रथम और अंतिम दो दिन, अथवा केवल अष्टमी-नवमी को।
  • अन्न, नमक (सेंधा नमक को छोड़कर), प्याज, लहसुन, मद्य और मांस पूर्णतः वर्जित।
  • घटस्थापना प्रतिपदा के प्रथम तृतीयांश में; चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में तथा रात्रि में वर्जित।
  • बोए गए जौ को प्रतिदिन जल दिया जाता है, वे सूखने न पाएँ।
  • परंपरा से नौ दिन केश और नख नहीं काटे जाते, और कलश-स्थल सूना नहीं छोड़ा जाता।

व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

ग्रहण करें

  • फलाहार — फल और दूध
  • कुट्टू, सिंघाड़ा और समक-चावल के व्यंजन
  • साबूदाना खिचड़ी और मखाना
  • आलू और कद्दू, सेंधा नमक सहित
  • कन्या-पूजन भोग: हलवा, पूरी, काले चने

त्यागें

  • अन्न — गेहूँ और चावल
  • साधारण नमक
  • प्याज और लहसुन
  • मांसाहार और मद्य

शारदीय नवरात्रि प्रारंभ की व्रत कथा

महिषासुर को वरदान था कि कोई पुरुष और कोई देव उसका वध न कर सकेगा; उसने स्त्री से रक्षा का विचार नहीं किया था। उसने स्वर्ग ले लिया, और देवगण उससे न लड़ सके, अतः उन्होंने अपनी समस्त शक्तियाँ एक साथ अर्पित कीं। उस संयुक्त तेज से दुर्गा प्रकट हुईं, और प्रत्येक देव ने उन्हें अपना आयुध दिया — शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, इंद्र का वज्र — और हिमवान ने सिंह दिया।

नौ रात्रि युद्ध चला। महिषासुर बार-बार रूप बदलता रहा — महिष, सिंह, मनुष्य, गज — और अंत में जब वह महिष के शरीर से अर्ध-प्रकट हुआ, तब देवी ने उसे चरण से दबाकर त्रिशूल से बींध दिया। दसवें दिन, विजयादशमी को, विजय का समाचार लोक तक पहुँचा। युद्ध की वही नौ रात्रियाँ नवरात्रि हैं।

क्षेत्रीय भिन्नताएँ

उत्तर भारत

नौ दिन का व्रत, अखंड ज्योत, प्रति संध्या रामलीला, और अष्टमी या नवमी को कन्या-पूजन।

गुजरात

प्रति रात्रि गरबा और डांडिया-रास, दीप-सज्जित मिट्टी के घट के चारों ओर वृत्त में।

बंगाल एवं पूर्व

दुर्गा पूजा — भव्य पाँच-दिवसीय पंडाल पर्व, षष्ठी से दशमी, विजयादशमी को विसर्जन सहित।

दक्षिण भारत

गोलू / बोम्मई कोलु — गुड़ियों और देवताओं का सोपानबद्ध प्रदर्शन; अंत के निकट सरस्वती पूजा और आयुध पूजा।

सामान्य प्रश्न

घटस्थापना का सही समय क्या है?

प्रतिपदा तिथि के प्रथम तृतीयांश में, दिन के समय। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में वर्जित; रात्रि में अथवा अमावस्या में कभी नहीं।

दुर्गा के कौन-से नौ स्वरूप पूजे जाते हैं?

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री — इसी क्रम में, प्रत्येक रात्रि एक।

क्या नौ दिन उपवास आवश्यक है?

नहीं। नौ दिन, अथवा प्रथम और अंतिम दो दिन, अथवा केवल अष्टमी-नवमी — सभी रूप मान्य हैं। जो वैकल्पिक नहीं है वह है व्रत के दिनों में अन्न, प्याज, लहसुन और मांस का त्याग।

Festival days follow the classical attribution rules — udaya (sunrise), pradosha (evening), nishita (midnight), madhyahna or aparahna vyapini as each festival prescribes — computed for Kashi/Varanasi (IST). Regional observance can differ by a day in some years.

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