दीपावली (लक्ष्मी पूजा) 2026
प्रकाश पर्व — प्रदोष काल में अमावस्या व्याप्त रहते लक्ष्मी पूजन।
आज का पंचांग
काशी संदर्भ · तुरंत गणना- तिथि
- सप्तमी
- तक 20:47
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- अश्विनी
- तक 21:21
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- 05:26
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- 18:41
- चंद्र राशि
- मेष
- सूर्य राशि
- कर्क
मुहूर्त और समय
काशी/IST · खगोलीय गणना- संकल्प (सूर्योदय)06:10
- प्रदोष पूजा मुहूर्त17:13 – 19:37
- व्रत अवधि (तिथि)11:30 → 2026-11-09 · 12:31
- पारण (तिथि समाप्ति)12:312026-11-09
दीपावली (लक्ष्मी पूजा) का महत्व
दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है — चंद्र वर्ष की सबसे अंधेरी रात। यही चुनाव पर्व का पूरा अर्थ है: दीपक का महत्व इसलिए है क्योंकि रात निष्चंद्र है। समृद्धि और कल्याण की देवी लक्ष्मी को उस घर में आमंत्रित किया जाता है जिसे स्वच्छ, व्यवस्थित और आलोकित किया गया हो।
भिन्न क्षेत्रों में इस पर्व की भिन्न स्मृतियाँ हैं, और सभी को समान रूप से सत्य माना जाता है। उत्तर भारत चौदह वर्ष के वनवास के बाद श्रीराम के अयोध्या-आगमन का स्मरण करता है, जब नगर ने दीप-पंक्तियाँ सजाकर उनका मार्ग आलोकित किया। दक्षिण भारत में श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर-वध का स्मरण होता है। जैन परंपरा में यह भगवान महावीर का निर्वाण-दिवस है, और सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस, जब गुरु हरगोबिंद जी बावन राजाओं सहित ग्वालियर दुर्ग से मुक्त हुए।
लक्ष्मी पूजन संध्या को प्रदोष काल में किया जाता है — वह अवधि जो सूर्यास्त से आरंभ होती है — और स्थिर लग्न को श्रेष्ठ माना जाता है, ताकि आमंत्रित लक्ष्मी स्थिर रहें।
दीपावली (लक्ष्मी पूजा) की पौराणिक पृष्ठभूमि
इस एक अमावस्या की रात्रि पर अनेक कथाएँ मिलती हैं। उत्तर में यह वही रात्रि है जब राम चौदह वर्ष के वनवास और रावण-वध के पश्चात अयोध्या लौटे; नगर ने अंधकार में उन्हें घर लाने को दीप-पंक्तियाँ जलाईं। यही वह रात्रि है जब समुद्र-मंथन से लक्ष्मी प्रकट हुईं, और — एक अन्य कथा में — उन्होंने विष्णु को वर रूप में चुना, अतः स्वच्छ, प्रकाशित घरों में उनका स्वागत होता है। दक्षिण में एक दिन पूर्व कृष्ण द्वारा नरकासुर-वध मनाया जाता है। इन सबका एक सूत्र है — वर्ष की सबसे अंधेरी रात्रि को उत्तर देता एक दीप।
ऋतु एवं वैज्ञानिक महत्व
दीवाली कार्तिक की अमावस्या को पड़ती है — वर्षा के ठीक बाद की सबसे अंधेरी रात्रि, जब शीत आरंभ होता है। दीप और भली-भाँति स्वच्छ किया घर उस अंधकार का व्यावहारिक और प्रतीकात्मक दोनों उत्तर हैं: शीत के आरंभ पर उष्णता, और जहाँ प्रकाश सबसे कम वहाँ प्रकाश। यह भारत के अधिकांश भाग में कृषि-वर्ष का समापन है — फसल घर आ चुकी — इसीलिए व्यापारी नई बही-खाता आरंभ करते हैं और क्रय-दान का काल यहीं से प्रारंभ होता है।
आध्यात्मिक महत्व
दीवाली अंधकार पर प्रकाश और अज्ञान पर ज्ञान की विजय है — किंतु दीप केवल द्वार पर नहीं, भीतर जलाने के लिए है। लक्ष्मी, जिनका यह पर्व स्वागत करता है, केवल धन नहीं; वे श्री हैं — वह मंगल और कृपा जो केवल वहाँ बसती है जहाँ स्वच्छता, व्यवस्था और उदारता हो। दीप अंधकार से कुछ नहीं माँगता, बस इतना कि उसके विरुद्ध एक ज्योति जल उठे।
दीपावली (लक्ष्मी पूजा) पूजा विधि
- 1घर की पूर्ण सफाई करें और द्वार पर रंगोली बनाएँ; पूजन के समय मुख्य द्वार खुला रखें।
- 2सूर्यास्त से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजन प्रदोष काल में आरंभ करें।
- 3चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएँ। गणेश और लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें — गणेश जी लक्ष्मी जी के दाहिनी ओर।
- 4समीप आम्रपत्र और नारियल सहित जल-कलश रखें। चौकी पर सिक्के, बही-खाते अथवा व्यापार-पुस्तिका रखें।
- 5घी का दीप जलाएँ; हल्दी, कुमकुम, अक्षत, पुष्प, पान और मिष्ठान्न अर्पित करें। गणेश जी को दूर्वा और लक्ष्मी जी को कमल अर्पित करें।
- 6प्रथम गणेश जी का आवाहन करें — प्रत्येक कर्म उन्हीं से आरंभ होता है — तत्पश्चात लक्ष्मी जी का। लक्ष्मी मंत्र का जप कर आरती करें।
- 7प्रसाद वितरित करें, फिर सम्पूर्ण घर और द्वार पर दीप प्रज्वलित करें।
पूजा सामग्री
- मिट्टी के दीये और बाती सहित तेल / घी
- लक्ष्मी–गणेश की मूर्ति या चित्र
- कलश और सिक्के / चाँदी
- कुमकुम, रोली, अक्षत, चंदन
- कमल या गेंदे के पुष्प
- खील, बताशे और मिष्ठान्न
- गंगाजल और शंख
- कर्पूर और धूप
- कौड़ी और नई बही-खाता (व्यापारियों हेतु)
मंत्र
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Om Shreem Mahalakshmyai Namah
महालक्ष्मी को नमस्कार, जिनमें समृद्धि साकार होती है।
व्रत के नियम
- दीपावली पर कोई अनिवार्य उपवास नहीं है; यह दिन स्वच्छता, सज्जा और पूजन का है, संयम-व्रत का नहीं।
- अनेक परिवार संध्या-पूजन से पूर्व केवल हल्का सात्विक आहार लेते हैं और पूजन के पश्चात भोजन करते हैं।
- घर की पूर्ण सफाई पहले कर ली जाती है — कहा जाता है कि लक्ष्मी वहीं आती हैं जहाँ स्वच्छता और व्यवस्था हो।
- प्रत्येक द्वार और खिड़की पर दीप जलाए जाते हैं, और कम-से-कम एक दीप रात्रि भर प्रज्वलित रखा जाता है।
- कुछ क्षेत्रों में इस रात्रि द्यूत-क्रीड़ा प्रचलित है, किंतु उसका कोई शास्त्रीय विधान नहीं है।
व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
ग्रहण करें
- मिठाइयाँ — काजू कतली, लड्डू, बर्फी, सोन पापड़ी
- चिवड़ा, मठरी, शक्करपारे और नमकीन
- खील-बताशा (लक्ष्मी-पूजा का प्रसाद)
- मेवे और साथ किया गया उत्सव-भोज
त्यागें
- अनेक इस दिन शाकाहारी / सात्त्विक रहते हैं
- श्रद्धालु घरों में प्याज-लहसुन त्यागा जाता है
- पूजा के समय मांसाहार और मद्य
दीपावली (लक्ष्मी पूजा) की व्रत कथा
जब देवों और असुरों ने क्षीरसागर का मंथन किया, तब लक्ष्मी कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुईं, और उपस्थित समस्त प्राणियों में से उन्होंने विष्णु का वरण किया। कथा कहती है कि समृद्धि वहीं जाती है जहाँ धर्म पहले से स्थित हो — वह छीनी नहीं जाती, प्राप्त होती है।
यह रात्रि श्रीराम के गृह-आगमन की भी है। वनवास के चौदह वर्ष पश्चात अयोध्या को उनके लौटने का समाचार मिला। नगरवासियों के पास योग्य स्वागत की तैयारी का समय नहीं था, अतः उन्होंने वही किया जो कर सकते थे: अपने समस्त दीप जलाकर मार्गों, घाटों और छतों पर सजा दिए, यहाँ तक कि अमावस्या की रात्रि पूर्णिमा से अधिक उज्ज्वल हो उठी। कहा जाता है कि राम ने उस नगर में प्रवेश किया जिसने अपना प्रकाश स्वयं रच लिया था।
क्षेत्रीय भिन्नताएँ
उत्तर भारत
राम का लौटना और संध्या की लक्ष्मी–गणेश पूजा, धनतेरस से भाई दूज तक के पाँच-दिवसीय क्रम के केंद्र में।
गुजरात एवं पश्चिम
चोपड़ा पूजन — व्यापारी नई बही और शारदा/लक्ष्मी की पूजा करते हैं; अगली प्रातः नववर्ष (बेस्तु वरस) आरंभ होता है।
दक्षिण भारत
दीपावली एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी रूप में — कृष्ण द्वारा नरकासुर-वध का स्मरण करता प्रातःकालीन तैलाभ्यंग स्नान।
बंगाल एवं पूर्व
यही अमावस्या की रात्रि काली पूजा है — रात्रि-पर्यंत पूजित उग्र माता।
सामान्य प्रश्न
दीपावली पर लक्ष्मी पूजन का सही समय क्या है?
लक्ष्मी पूजन प्रदोष काल में किया जाता है, जो सूर्यास्त से आरंभ होता है, और वृषभ जैसे स्थिर लग्न में श्रेष्ठ माना जाता है। सटीक समय नगर के अनुसार बदलता है, क्योंकि वह स्थानीय सूर्यास्त पर निर्भर है।
दीपावली अमावस्या की रात्रि को क्यों मनाई जाती है?
कार्तिक अमावस्या चंद्र वर्ष की सर्वाधिक अंधकारमय रात्रि है। उसी पर दीप जलाना ही मर्म है: यह पर्व वहाँ प्रकाश उत्पन्न करने का है जहाँ प्रकाश दिया नहीं गया।
गणेश जी को लक्ष्मी जी के दाएँ रखें या बाएँ?
प्रतिमाओं के सम्मुख खड़े होकर देखने पर गणेश जी लक्ष्मी जी के दाहिनी ओर स्थापित किए जाते हैं। आवाहन सर्वप्रथम उन्हीं का होता है, क्योंकि प्रत्येक कर्म उन्हीं से आरंभ होता है।
Festival days follow the classical attribution rules — udaya (sunrise), pradosha (evening), nishita (midnight), madhyahna or aparahna vyapini as each festival prescribes — computed for Kashi/Varanasi (IST). Regional observance can differ by a day in some years.
Other major festivals in 2026
- मकर संक्रांति — 14 जनवरी 2026
- वसंत पंचमी — 23 जनवरी 2026
- महाशिवरात्रि — 15 फ़रवरी 2026
- होलिका दहन — 2 मार्च 2026
- होली — 4 मार्च 2026
- चैत्र नवरात्रि प्रारंभ — 19 मार्च 2026
- राम नवमी — 26 मार्च 2026
- अक्षय तृतीया — 19 अप्रैल 2026
- जगन्नाथ रथ यात्रा — 16 जुलाई 2026
- गुरु पूर्णिमा — 29 जुलाई 2026
- नाग पंचमी — 17 अगस्त 2026
- रक्षा बंधन — 28 अगस्त 2026
- कृष्ण जन्माष्टमी — 4 सितंबर 2026
- हरतालिका तीज — 14 सितंबर 2026
- गणेश चतुर्थी — 14 सितंबर 2026
- अनंत चतुर्दशी — 25 सितंबर 2026
- पितृ पक्ष प्रारंभ — 27 सितंबर 2026
- शारदीय नवरात्रि प्रारंभ — 11 अक्टूबर 2026
- दुर्गा अष्टमी — 19 अक्टूबर 2026
- महानवमी — 20 अक्टूबर 2026
- दशहरा / विजयादशमी — 20 अक्टूबर 2026
- करवा चौथ — 29 अक्टूबर 2026
- धनतेरस — 6 नवंबर 2026
- नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) — 8 नवंबर 2026
- गोवर्धन पूजा — 10 नवंबर 2026
- भाई दूज — 11 नवंबर 2026
- छठ पूजा — 15 नवंबर 2026
- कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) — 24 नवंबर 2026
- गुरु नानक जयंती — 24 नवंबर 2026
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