पर्व कैलेंडर

कृष्ण जन्माष्टमी 2026

मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म — निशिता में व्याप्त भाद्रपद कृष्ण अष्टमी।

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 तिथि
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
तिथि: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी
तिथि अवधि: 02:29 AM, शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 → 12:19 AM, शनिवार, 5 सितंबर 2026

आज का पंचांग

काशी संदर्भ · तुरंत गणना
तिथि
नवमी
तक 17:50
नक्षत्र
पूर्व आषाढ़ा
तक 04:31
योग
सौभाग्य
करण
कौलव
सूर्योदय
05:45
सूर्यास्त
17:57
चंद्र राशि
धनु
सूर्य राशि
कन्या

मुहूर्त और समय

काशी/IST · खगोलीय गणना
  • संकल्प (सूर्योदय)05:39
  • निशीथ पूजा (मध्यरात्रि)23:33 – 00:21
  • व्रत अवधि (तिथि)02:29 → 2026-09-05 · 00:19
  • पारण (तिथि समाप्ति)00:192026-09-05

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 में क्या विशेष है

काशी / IST संदर्भ

2026 में कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार को पड़ रही है।

यह पर्व कैलेंडर की तारीख़ से नहीं, चंद्र तिथि से तय होता है — इसलिए हर वर्ष ग्रेगोरियन तिथि बदलती है:

इस अवसर के लिए गणना किए गए समय

  • संकल्प (सूर्योदय)05:39
  • निशीथ पूजा (मध्यरात्रि)23:33 – 00:21
  • तिथि अवधि02:29 → 2026-09-05 · 00:19

2026 में उस दिन का पंचांग

  • नक्षत्ररोहिणी
  • योगहर्षण
  • करणबालव
  • चंद्र राशिवृषभ
  • सूर्योदय / सूर्यास्त05:39 – 18:15
  • राहु काल (वर्जित)10:23 – 11:57

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 के आसपास

2026 में इसके एक सप्ताह के भीतर पड़ने वाले पर्व — यह क्रम इसी वर्ष का है:

उस दिन का पूरा पंचांग देखें

पर्व-दिन शास्त्रीय नियमों से निर्धारित हैं — उदया, प्रदोष, निशिता, मध्याह्न या अपराह्न व्यापिनी, जैसा प्रत्येक पर्व का विधान है — काशी/वाराणसी (IST) हेतु गणना। कुछ वर्षों में क्षेत्रीय पालन एक दिन आगे-पीछे हो सकता है।

कृष्ण जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है

कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व है। परंपरा कहती है कि उनका जन्म अर्धरात्रि में, कारागार में, रोहिणी नक्षत्र में हुआ — और व्रत इसी विवरण का अनुसरण करता है। पूजन निशीथ काल में होता है, प्रातः नहीं।

परिस्थिति का महत्व जन्म से कम नहीं। कृष्ण बंदीगृह में अवतरित होते हैं, उन माता-पिता के यहाँ जो वध की प्रतीक्षा में हैं, उस अत्याचारी के राज्य में जो उनके छह शिशुओं का वध कर चुका है। अतः यह पर्व सुख का उत्सव नहीं, अपितु उस स्थान पर दिव्यता के आगमन का है जहाँ वह असंभव प्रतीत होती है।

जहाँ अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र एक ही रात्रि में नहीं मिलते, वहाँ भिन्न समुदायों में व्रत भिन्न दिन पड़ सकता है — स्मार्त और वैष्णव परंपराएँ एक दिन के अंतर से मना सकती हैं। अपनी-अपनी गणना में दोनों उचित हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि — संक्षेप में

  1. प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा-स्थल स्वच्छ कर बाल-गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें, यथासंभव छोटे पालने में।
  3. पूजन निशीथ काल के लिए सुरक्षित रखें — वही अर्धरात्रि की अवधि जिसमें जन्म माना जाता है।
  4. अर्धरात्रि में प्रतिमा का पंचामृत — दूध, दही, घी, मधु और शर्करा — से अभिषेक करें। तत्पश्चात जल से स्नान कराकर वस्त्र पहनाएँ।
  5. तुलसीदल अर्पित करें — उनके बिना कृष्ण का कोई भोग पूर्ण नहीं — साथ ही माखन-मिश्री और फल।
  6. पालना झुलाएँ, जन्म-गीत गाएँ और आरती करें। शंख हो तो शंखनाद करें।
  7. प्रसाद वितरित करें। पूजन के पश्चात व्रत खोलें और अगले प्रातः पारण पूर्ण करें।

आवश्यक पूजा सामग्री

  • बाल कृष्ण की मूर्ति या चित्र
  • छोटा झूला
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • भोग हेतु माखन और मिश्री
  • तुलसी दल
  • बाँसुरी और मोरपंख
  • देव हेतु नए वस्त्र और आभूषण
  • पुष्प और माला
  • चंदन, रोली, अक्षत
  • शंख और घंटी
  • धूप और दीपक
कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा विधि, व्रत नियम और कथा पढ़ें

कृष्ण जन्माष्टमी — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जन्माष्टमी का पूजन अर्धरात्रि में क्यों होता है?

श्रीकृष्ण का जन्म अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में माना जाता है, अतः पूजन प्रातः नहीं, निशीथ काल में किया जाता है। उसके पश्चात व्रत खोला जाता है।

जन्माष्टमी की तिथि कभी-कभी एक दिन आगे-पीछे क्यों होती है?

स्मार्त परंपरा अर्धरात्रि की अष्टमी तिथि को मानती है; वैष्णव परंपरा रोहिणी नक्षत्र की भी अपेक्षा कर सकती है और उदया-तिथि के नियम भिन्न रूप से लगाती है। दोनों के न मिलने पर व्रत एक दिन के अंतर से पड़ता है।

जन्माष्टमी व्रत में क्या खाया जा सकता है?

फल, दूध, दही, जल तथा कुट्टू और सिंघाड़े जैसे व्रत के आटे। अन्न, प्याज और लहसुन अगले प्रातः पारण तक वर्जित रहते हैं।

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