हिंदू पर्व

कृष्ण जन्माष्टमी

मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म — निशिता में व्याप्त भाद्रपद कृष्ण अष्टमी।

कृष्ण जन्माष्टमी
आरंभ में
00दिन
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00घंटे
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00मिनट
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00सेकंड

आज का पंचांग

काशी संदर्भ · तुरंत गणना
तिथि
सप्तमी
तक 20:47
नक्षत्र
अश्विनी
तक 21:21
योग
शूल
करण
विष्टि
सूर्योदय
05:26
सूर्यास्त
18:41
चंद्र राशि
मेष
सूर्य राशि
कर्क

मुहूर्त और समय

काशी/IST · खगोलीय गणना
  • संकल्प (सूर्योदय)05:39
  • निशीथ पूजा (मध्यरात्रि)23:33 – 00:21
  • व्रत अवधि (तिथि)02:29 → 2026-09-05 · 00:19
  • पारण (तिथि समाप्ति)00:192026-09-05

कृष्ण जन्माष्टमी कब है

तिथियाँ काशी के सूर्योदय के अनुसार खगोलीय गणना से निकाली गई हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व

कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व है। परंपरा कहती है कि उनका जन्म अर्धरात्रि में, कारागार में, रोहिणी नक्षत्र में हुआ — और व्रत इसी विवरण का अनुसरण करता है। पूजन निशीथ काल में होता है, प्रातः नहीं।

परिस्थिति का महत्व जन्म से कम नहीं। कृष्ण बंदीगृह में अवतरित होते हैं, उन माता-पिता के यहाँ जो वध की प्रतीक्षा में हैं, उस अत्याचारी के राज्य में जो उनके छह शिशुओं का वध कर चुका है। अतः यह पर्व सुख का उत्सव नहीं, अपितु उस स्थान पर दिव्यता के आगमन का है जहाँ वह असंभव प्रतीत होती है।

जहाँ अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र एक ही रात्रि में नहीं मिलते, वहाँ भिन्न समुदायों में व्रत भिन्न दिन पड़ सकता है — स्मार्त और वैष्णव परंपराएँ एक दिन के अंतर से मना सकती हैं। अपनी-अपनी गणना में दोनों उचित हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक पृष्ठभूमि

मथुरा के कंस को चेतावनी मिली थी कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी, अतः उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल हर नवजात का वध किया। आठवें कृष्ण थे, अर्धरात्रि को कारागार में जन्मे। पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं, और वसुदेव शिशु को उमड़ती यमुना पार गोकुल ले गए — कहते हैं नदी ने मार्ग दिया और शेषनाग ने वर्षा से फणों का छत्र किया। वहाँ कृष्ण यशोदा की नवजात कन्या से बदल दिए गए और ब्रज में ग्वाले रूप में बड़े हुए। निशीथ जन्म के कारण ही व्रत अर्धरात्रि को खोला जाता है।

ऋतु एवं वैज्ञानिक महत्व

जन्माष्टमी भाद्रपद में, वर्षा के गहन काल में पड़ती है, जब यमुना उफान पर होती है — वसुदेव जिस बाढ़ को पार करते हैं वह ऋतु ही है। जन्म रोहिणी नक्षत्र और सौर अर्धरात्रि से जुड़ा है, और परंपरा इसे घड़ी से नहीं, चंद्र-गणना से निर्धारित करती है। अगले दिन की दही-हांडी — ऊँचे बँधे दही के मटके को तोड़ने हेतु मानव-पिरामिड — कृष्ण की माखनचोरी को संतुलन, समय और सहकार के सार्वजनिक कौशल में बदल देती है।

आध्यात्मिक महत्व

परमात्मा जन्म हेतु सर्वाधिक अंधकारमय क्षण और सर्वाधिक बंधनयुक्त स्थान चुनता है — अर्धरात्रि, कारागार। यही सम्पूर्ण शिक्षा है: प्रकाश अनुकूल परिस्थिति की प्रतीक्षा नहीं करता; वह बंधन के भीतर आता है और ताले खोल देता है। कृष्ण केवल ब्रज के शिशु नहीं, अंतर्स्थ आत्मा हैं, और उनकी लीला — विनोदमयी, निश्छल, पूर्णतः मुक्त — उस का चिह्न है जो कर्म से बँधे बिना कर्म करता है।

कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि

  1. 1प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
  2. 2पूजा-स्थल स्वच्छ कर बाल-गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें, यथासंभव छोटे पालने में।
  3. 3पूजन निशीथ काल के लिए सुरक्षित रखें — वही अर्धरात्रि की अवधि जिसमें जन्म माना जाता है।
  4. 4अर्धरात्रि में प्रतिमा का पंचामृत — दूध, दही, घी, मधु और शर्करा — से अभिषेक करें। तत्पश्चात जल से स्नान कराकर वस्त्र पहनाएँ।
  5. 5तुलसीदल अर्पित करें — उनके बिना कृष्ण का कोई भोग पूर्ण नहीं — साथ ही माखन-मिश्री और फल।
  6. 6पालना झुलाएँ, जन्म-गीत गाएँ और आरती करें। शंख हो तो शंखनाद करें।
  7. 7प्रसाद वितरित करें। पूजन के पश्चात व्रत खोलें और अगले प्रातः पारण पूर्ण करें।

पूजा सामग्री

  • बाल कृष्ण की मूर्ति या चित्र
  • छोटा झूला
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • भोग हेतु माखन और मिश्री
  • तुलसी दल
  • बाँसुरी और मोरपंख
  • देव हेतु नए वस्त्र और आभूषण
  • पुष्प और माला
  • चंदन, रोली, अक्षत
  • शंख और घंटी
  • धूप और दीपक

मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Om Namo Bhagavate Vasudevaya

वासुदेव को नमस्कार, जो सबके भीतर विराजमान हैं।

व्रत के नियम

  • व्रत दिन भर रखा जाता है और अर्धरात्रि को जन्मोत्सव के पश्चात खोला जाता है — सूर्यास्त पर नहीं।
  • कुछ निर्जला व्रत रखते हैं; अधिकांश दिन भर फल, दूध और जल ग्रहण करते हैं।
  • अन्न, प्याज और लहसुन वर्जित हैं। कुट्टू और सिंघाड़े का आटा ग्राह्य है।
  • जो पूर्ण उपवास न कर सकें, वे अर्धरात्रि पूजन के पश्चात एक बार सात्विक भोजन ले सकते हैं।
  • व्रत का पारण अगले प्रातः किया जाता है, परंपरा से अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों की समाप्ति के पश्चात।

व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

ग्रहण करें

  • फलाहार — फल, दूध और दुग्ध-उत्पाद
  • मखाना, साबूदाना और सिंघाड़ा/कुट्टू के व्यंजन
  • पंचामृत और चरणामृत
  • माखन-मिश्री और धनिया पंजीरी (पारंपरिक भोग)
  • साधारण नमक के स्थान पर सेंधा नमक

त्यागें

  • अन्न — चावल, गेहूँ और दालें
  • साधारण नमक
  • प्याज और लहसुन
  • मांसाहार और मद्य

कृष्ण जन्माष्टमी की व्रत कथा

मथुरा के राजा कंस को आकाशवाणी ने बताया कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा। उसने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया और जन्म लेते ही प्रत्येक शिशु का वध कर दिया। छह मारे गए। सातवें, बलराम, रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हुए। आठवें कृष्ण थे।

उनका जन्म कारागार में अर्धरात्रि को हुआ। पहरेदार निद्रा में चले गए, बेड़ियाँ खुल गईं, और कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। वसुदेव नवजात को लेकर उमड़ती यमुना पार कर गए, जिसने उनके लिए मार्ग दिया, और शेषनाग ने वर्षा से रक्षा हेतु फण फैला दिए। गोकुल में उन्होंने शिशु को यशोदा की नवजात कन्या से बदला और लौट आए। जब कंस आठवें शिशु का वध करने आया, तो वह कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश में उठ गई और बोली कि जिसे वह खोज रहा है वह जन्म ले चुका है, और अन्यत्र है।

क्षेत्रीय भिन्नताएँ

ब्रज — मथुरा एवं वृंदावन

हृदय-स्थल: अर्धरात्रि अभिषेक, झाँकियाँ और रासलीला; कृष्ण के जन्मस्थान और बाल्यकाल के मंदिर।

महाराष्ट्र

अगली प्रातः गोपालकाला और दही-हांडी — ऊँचे बँधे दही-मटके को तोड़ने की मानव-पिरामिड स्पर्धा।

दक्षिण भारत

गोकुलाष्टमी / श्रीकृष्ण जयंती — पूजा-कक्ष तक बनाए गए नन्हे चरण-चिह्न, और सीडै, मुरुक्कु व माखन का भोग।

गुजरात एवं द्वारका

समुद्र-तट पर कृष्ण के राज्य द्वारका में विशेष पूजा; रात्रि-पर्यंत भजन और अभिषेक।

सामान्य प्रश्न

जन्माष्टमी का पूजन अर्धरात्रि में क्यों होता है?

श्रीकृष्ण का जन्म अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में माना जाता है, अतः पूजन प्रातः नहीं, निशीथ काल में किया जाता है। उसके पश्चात व्रत खोला जाता है।

जन्माष्टमी की तिथि कभी-कभी एक दिन आगे-पीछे क्यों होती है?

स्मार्त परंपरा अर्धरात्रि की अष्टमी तिथि को मानती है; वैष्णव परंपरा रोहिणी नक्षत्र की भी अपेक्षा कर सकती है और उदया-तिथि के नियम भिन्न रूप से लगाती है। दोनों के न मिलने पर व्रत एक दिन के अंतर से पड़ता है।

जन्माष्टमी व्रत में क्या खाया जा सकता है?

फल, दूध, दही, जल तथा कुट्टू और सिंघाड़े जैसे व्रत के आटे। अन्न, प्याज और लहसुन अगले प्रातः पारण तक वर्जित रहते हैं।

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साझा करने योग्य शुभकामनाएँ

कान्हा आपकी चिंताएँ वैसे ही चुरा लें जैसे माखन, और आपके घर को प्रेम से भर दें। जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ!

कृष्ण-जन्म की इस पावन रात्रि आपका जीवन संगीत, लीला और दिव्य कृपा से भर जाए। जय श्री कृष्ण!

उद्धरण

जब-जब धर्म की हानि होती है, मैं जन्म लेता हूँ — गीता का वचन, इस रात्रि स्मरणीय।

अपना कर्म करो, शेष कृष्ण पर छोड़ दो — यही जन्माष्टमी का सार है।

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